Chapter 7: जलाते चलो
इस कविता में कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी प्रेम और भलाई के दीये जलाते रहने की प्रेरणा देते हैं, ताकि दुनिया का अँधेरा मिट सके। कविता अपनी किताब “मल्हार” में पढ़िए, फिर इन विषयों से उसके प्रतीक, लय और भाषा समझिए, और चंद्रमा की कलाओं के बारे में जानिए।
Is chapter mein tum
- कविता का भाव और उसके प्रतीक समझाना
- कविता की लय और बनावट पहचानना
- शब्द-रूप और समानता वाले सा/सी/से का प्रयोग करना
- अमावस्या, पूर्णिमा और तिथिपत्र को समझना
Topics
- पढ़ें: कविता का भाव NCERT पृ. 60–61
प्रेम और भलाई के दीये जलाते रहो, अँधेरा (बुराई, दुख) कभी न कभी मिटेगा।
- पाठ से: समझ और कविता की रचना NCERT पृ. 62–65
अमावस = चाँद रहित रात, पूर्णिमा = पूरे चाँद की रात, तिमिर = अँधेरा, युग = काल।
- भाषा की बात: प्रतीक, शब्द-रूप और -सा/-सी/-से NCERT पृ. 65–69
निशा = दुख, बुराई; सवेरा = सुख, आशा: ये कविता के प्रतीक हैं।
- पाठ से आगे: चंद्रमा की कलाएँ और तिथिपत्र NCERT पृ. 69–74
चंद्रमा सूर्य के प्रकाश से चमकता है; शुक्ल पक्ष में कलाएँ बढ़ती हैं, कृष्ण पक्ष में घटती हैं।
Key words
- स्नेह
- प्रेम; दीये का तेल
- तिमिर
- अँधेरा
- अमावस
- जिस रात चाँद न दिखे
- पूर्णिमा
- जिस रात पूरा चाँद दिखे
- प्रतीक
- किसी बड़े भाव को दिखाने वाला चिह्न या शब्द
- निरंतर
- लगातार
Summary
- स्नेह भरे दीये (भलाई) जलाते रहो, अँधेरा (बुराई) कभी तो मिटेगा।
- बिना प्रेम के केवल विज्ञान की चमक से सही रास्ता नहीं मिलता।
- निशा और सवेरा प्रतीक हैं; समानता में -सा/-सी/-से से पहले योजक लगता है।
- शुक्ल पक्ष में चाँद बढ़ता, कृष्ण पक्ष में घटता है।